पाटलिपुत्र से पटना तक की यात्रा
भारत के इतिहास में कुछ शहर ऐसे हैं जो सिर्फ़ ईंटों और पत्थरों से नहीं बने, बल्कि सदियों की कहानियों, संघर्षों और महान साम्राज्यों की नींव से बने हैं। ऐसा ही एक शहर है पटना।
आज का पटना बिहार की राजधानी है, लेकिन इसका अतीत इतना विशाल है कि इतिहास के पन्ने पलटते ही इसका नाम बदलकर पाटलिपुत्र हो जाता है। यह वह शहर है जो दुनिया के नक्शे पर एक समय शक्ति, शिक्षा और सभ्यता के केंद्र के रूप में चमकता था। यह सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि एक टाइम कैप्सूल है जो हमें सीधे मौर्य और गुप्त साम्राज्यों के दरबार में ले जाता है।
गंगा का वरदान और नाम की कहानी:
पटना के अस्तित्व का सबसे बड़ा कारण है इसकी भौगोलिक स्थिति। यह पवित्र गंगा नदी के दक्षिणी तट पर, तीन प्रमुख नदियों—गंगा, सोन और गंडक—के संगम के पास स्थित है। इस “त्रिवेणी” ने इसे व्यापार, सुरक्षा और कृषि के लिए एक आदर्श स्थान बना दिया।
शुरुआत में, इसे मगध के राजा अजातशत्रु ने गंगा किनारे एक छोटी बस्ती (पाटलिग्राम) के रूप में स्थापित किया था।
कालांतर में, जब यह नगर विश्व प्रसिद्ध राजधानी बना, तो इसे पाटलिपुत्र कहा गया। लोककथाओं के अनुसार, इसका नाम ‘पाटलि’ (एक प्रकार की घास) और ‘पुत्र’ (बेटा) से आया है।
वर्तमान नाम ‘पटना‘ इसे 16वीं शताब्दी में शेर शाह सूरी ने दिया था। कहा जाता है कि उन्होंने इस नाम को देवी ‘पटन देवी’ से जोड़ा या इसे ‘पट्टन’ (यानी बंदरगाह या व्यापारिक केंद्र) से लिया, जो इसकी व्यापारिक पहचान को दर्शाता था।
यह ब्लॉग हमें इसी महान शहर की 2,500 साल पुरानी यात्रा पर ले जाएगा—उस राजधानी से लेकर, जो सम्राटों की शक्ति का केंद्र थी, आज के आधुनिक बिहार के दिल तक।
प्राचीन गौरव: सम्राटों की राजधानी
पटना का इतिहास किसी परी कथा से कम नहीं है, जहाँ एक छोटी सी बस्ती विश्व की सबसे बड़ी राजधानी बन गई।
साम्राज्यों का उदय:
मगध का केंद्र (हर्यक वंश): पटना (तब पाटलिपुत्र) को मगध साम्राज्य की राजधानी के रूप में हर्यक वंश के राजा उदयीन द्वारा स्थापित किया गया था, जिन्होंने सुरक्षा और व्यापार के लिए इसकी रणनीतिक स्थिति को पहचाना।
मौर्य साम्राज्य का शिखर: पाटलिपुत्र का स्वर्णिम काल चंद्रगुप्त मौर्य और उनके पोते सम्राट अशोक के शासनकाल में आया। मौर्यों के अधीन, पाटलिपुत्र न केवल एक विशाल साम्राज्य की राजधानी बना, बल्कि ज्ञान, कला और वास्तुकला का भी केंद्र बन गया।
मेगास्थनीज का वर्णन: यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में इस शहर का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने इसे दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शानदार शहरों में से एक बताया था। उन्होंने लिखा कि यह शहर चारों ओर से विशाल लकड़ी की दीवार (Palisades) और गहरी खाई से घिरा हुआ था।
ज्ञान और कला का केंद्र (गुप्त काल):
मौर्यों के पतन के बाद, यह शहर फिर से गुप्त साम्राज्य के अधीन आया और इसने शिक्षा तथा संस्कृति के केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी।
इस काल में, पाटलिपुत्र ज्योतिष, गणित और चिकित्सा जैसे विषयों के लिए एक प्रमुख स्थान था। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट और संस्कृत कवि कालिदास का संबंध इसी क्षेत्र से रहा।
विदेशियों की आँख से:
पांचवीं शताब्दी ईस्वी में चीनी यात्री फाहियान ने पाटलिपुत्र का दौरा किया। उन्होंने अशोक के महल की भव्यता और शहर में स्वास्थ्य एवं शिक्षा के उत्कृष्ट संस्थानों (जैसे मुफ्त अस्पताल) को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया।
इस तरह, पाटलिपुत्र दो हज़ार वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नब्ज बना रहा।
मध्यकालीन इतिहास और पुनर्जागरण
प्राचीन गौरव के बाद, शहर ने मध्यकालीन इतिहास में कई बदलाव देखे, लेकिन इसकी पहचान कभी धूमिल नहीं हुई।
शेर शाह सूरी का पुनर्जागरण:
16वीं शताब्दी में, जब शेर शाह सूरी ने मुग़लों को हराकर सत्ता संभाली, तब उन्होंने शहर के सैन्य और वाणिज्यिक महत्व को पहचाना।
उन्होंने इस शहर का जीर्णोद्धार किया, एक मज़बूत किला बनाया, और इसे आधिकारिक तौर पर पटना नाम दिया। इस काल में, पटना एक महत्वपूर्ण नदी बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र के रूप में उभरा।
सिख धर्म का केंद्र:
मध्यकालीन पटना की सबसे अनूठी पहचान सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के साथ इसका जुड़ाव है। उनका जन्म 1666 ईस्वी में यहीं हुआ था।
आज, उनका जन्मस्थान तख्त श्री पटना साहिब के रूप में जाना जाता है, जो सिख धर्म के पाँच सबसे पवित्र तख्तों (पीठासीन प्राधिकरणों) में से एक है। यह पटना की सांस्कृतिक विविधता का सबसे सुंदर उदाहरण है।
ब्रिटिश राज के अधीन व्यापार:
17वीं शताब्दी में, यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ (जैसे अंग्रेज, डच और फ्रांसीसी) पटना की ओर आकर्षित हुईं क्योंकि यह बंगाल के भीतरी इलाकों में माल और कच्चे माल के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
ब्रिटिश राज के दौरान, पटना ने एक बड़े प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में कार्य किया, और आधुनिक बिहार के विकास की नींव यहीं रखी गई।
संस्कृति, विरासत और आधुनिक पटना
पटना आज भी अपने गौरवशाली अतीत को सँजोए हुए है, साथ ही भविष्य की ओर भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
विलुप्त होती ‘पटना कलम’ कला:
पटना की अपनी एक अनूठी चित्रकला शैली थी जिसे ‘पटना कलम’ या ‘कंपनी शैली’ के नाम से जाना जाता था। 18वीं और 19वीं शताब्दी में विकसित हुई यह शैली, रोजमर्रा के जीवन, स्थानीय बाज़ारों और आम लोगों के दृश्यों को दर्शाती थी। इसे भारतीय और यूरोपीय कला का मिश्रण माना जाता है।
प्रमुख दर्शनीय स्थल (विरासत):
तख्त श्री पटना साहिब: गुरु गोबिंद सिंह का जन्मस्थान, जो सिख समुदाय के लिए गहन आस्था का केंद्र है।
गोलघर: 1786 में ब्रिटिश इंजीनियर जॉन गारस्टिन द्वारा अकाल के समय अनाज भंडारण के लिए निर्मित एक विशाल, मधुमक्खी के छत्ते के आकार की संरचना। इसकी अनूठी वास्तुकला और ऊपर से शहर का मनोरम दृश्य इसे ख़ास बनाता है।
पटना संग्रहालय और बिहार संग्रहालय: ये आधुनिक और प्राचीन संग्रहालय पटना के हजारों वर्षों के इतिहास को प्रदर्शित करते हैं, जिनमें मौर्य काल के अवशेष, दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा (जो पटना संग्रहालय में थी, अब बिहार संग्रहालय में है) और स्थानीय कलाकृतियाँ शामिल हैं।
आधुनिक शिक्षा और प्रगति:
पटना अब केवल अतीत का शहर नहीं है; यह एक शैक्षिक केंद्र भी है। प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय, पटना मेडिकल कॉलेज, और एनआईटी पटना जैसे संस्थान इस शहर को ज्ञान और प्रतिभा का आधुनिक केंद्र बनाए हुए हैं।
निष्कर्ष: आधुनिक बिहार का दिल
पटना, जिसने लगभग दो सहस्राब्दियों तक पाटलिपुत्र के रूप में भारत के महान साम्राज्यों की शक्ति को देखा, आज भी बिहार के दिल के रूप में धड़कता है।
यह वह शहर है जहाँ प्राचीन इतिहास, महान धर्मों का आशीर्वाद, मध्यकालीन व्यापारिक बुद्धिमत्ता और आधुनिक भारत की प्रशासनिक ऊर्जा एक साथ मिलती है। यह बिहार की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है।
पटना की कहानी लचीलेपन की कहानी है—एक शहर जो आक्रमणों, विनाश और जीर्णोद्धार के बाद भी हमेशा खड़ा रहा। चाहे आप गोलघर की सीढ़ियों पर खड़े हों, गंगा घाट पर सूर्यास्त देख रहे हों, या तख्त श्री पटना साहिब की शांति महसूस कर रहे हों, आप एक ऐसे शहर के साक्षी होंगे जिसने दुनिया को सम्राट दिए, महान गुरु दिए, और लोकतंत्र के पाठ पढ़ाए। पटना अतीत और भविष्य के बीच का एक शानदार पुल है।
